मेरी भाषा
मृत्युंजय को ग्रेजुएशन किए बरसों बीत चुके थे।
डिग्री अब अलमारी में रखी एक काग़ज़ भर थी—जिसे वह रोज़ नहीं, पर उसकी नज़रें रोज़ ढूंढ लेती थीं।
जगह-जगह आवेदन, फिर इंतज़ार… और फिर वही सन्नाटा।
घर की चौखट के भीतर उसकी हैसियत धीरे-धीरे खिसकती जा रही थी।
माँ की आँखों में उम्मीद अब शब्दों में नहीं, चुप्पी में उतर आई थी।
छोटी बहन किताबें खोलती तो मृत्युंजय नज़रें फेर लेता—जैसे पढ़ाई का खर्च उसकी ही जेब से निकलना हो।
समय उसकी मुट्ठी से ऐसे फिसल रहा था, जैसे सूखी रेत—जितना कसो, उतनी तेज़ी से निकल जाए।
उसी दोपहर, मोबाइल की स्क्रीन जली।
रामावतार जी का संदेश।
उसने पढ़ा—और साँस अटक गई।
₹30,000…!
“बाप रे… कहाँ से लाऊँगा?”
दिल ने कहा—नामुमकिन।
दिमाग ने टोका—रामावतार जी हैं… भरोसे की बात है।
और फिर खुद को समझाया—तीस दिन ही तो हैं। तीस दिन बाद भी तो यही गाँव, यही लोग…
शाम ढलते-ढलते उसने फैसला कर लिया—दादी से बात करेगा।
दादी आज कई दिनों बाद उसे ऐसे सामने बैठा देख रही थीं—सीधे, चुप, और नज़रें झुकाए।
मृत्युंजय ने सारी बात कह दी। एक-एक शब्द जैसे भारी पत्थर बनकर गिरा।
दादी कुछ देर चुप रहीं।
फिर बिना कोई बड़ा भाषण दिए, अपने पाँवों की ओर झुकीं।
चांदी के कड़े… वही, जो उन्होंने बरसों से संभाल कर रखे थे।
धीरे-धीरे उतारकर उसकी हथेली पर रख दिए।
“जा… महाजन के पास। इन्हें गहन रख दे।
तीस दिन की ट्रेनिंग है।
कब तक घर में बैठा रहेगा, बेटा?”
मृत्युंजय की हथेली काँप गई।
ये कड़े नहीं हैं… मेरी दादी का भरोसा है, उसने मन ही मन कहा।
अब उसके भीतर कोई और ही आग जल चुकी थी।
जहाँ जो भी मज़दूरी मिली, उसने पकड़ ली।
दिन ढलते-ढलते पसीने की गंध में उसकी उम्मीद घुलने लगी।
शाम को दिहाड़ी गिनता—तो लगता, मैं अभी ज़िंदा हूँ।
कॉशन मनी, किराया, खर्च—सब धीरे-धीरे जुड़ने लगे।
उसने रामावतार जी के पास जाकर फॉर्म भरा।
कौस्तुभ ने फटाक से एलिजिबिलिटी टेस्ट लिया—और हाँ कह दी।
कुछ ही दिनों में एडमिशन डेट का संदेश आया।
मृत्युंजय ने तुरंत रेलवे रिज़र्वेशन कराया।
बैंक ड्राफ्ट बनवाया।
रामावतार जी ने सब अपलोड किया—और सीट नंबर आ गया।
माँ ने बिना ज़्यादा बोले, रास्ते भर के लिए परांठे और अचार बाँध दिए।
पोटली कसते हुए बस इतना कहा—
“ध्यान रखना बेटा।”
स्टेशन पहुँचते-पहुँचते दिशा का फोन आ गया।
“गाड़ी में बैठकर सीट की सेल्फी भेज देना।”
मृत्युंजय ने पहली बार महसूस किया—कोई है, जो देख रहा है कि मैं पहुँचा या नहीं।
मुंबई पहुँचा तो फिर फोन।
ड्राइवर रौन… फिर विहान…
सब कुछ तय, व्यवस्थित—जैसे उसकी ज़िंदगी पहली बार किसी नक्शे पर चल रही हो।
सोने की जगह देखकर वह सबसे पहले बाथरूम गया।
हाथ-पाँव धोए।
खाना खाया।
चद्दर ओढ़ी।
कल से नया जीवन…
यह सोचते-सोचते नींद आ गई।
सुबह जल्दी उठना था।
7 बजे कैंपस खुलता था।
ड्राफ्ट जमा हुआ।
रसीद पर सील लगी।
नाश्ते की खुशबू ने भूख जगा दी।
उसने बिना सोचे गरम नाश्ता खाया—आगे कब मिलेगा, कौन जाने।
घंटी बजी।
वॉचमैन सुरेश ने इशारे से क्लास में भेजा।
जूते-चप्पल रैक में रखे।
अपनी सीट पर बैठा।
चारों तरफ उसी जैसे चेहरे—डरे हुए, उम्मीद से भरे।
तभी क्लास टीचर अंदर आए और बोले—
“स्वागत है…”
मृत्युंजय सीधा बैठ गया।
यह कोई साधारण ट्रेनिंग नहीं थी।
यह उस दिन की शुरुआत थी, जब उसने फिर से खुद को सम्मान के साथ बैठते हुए पाया।

