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The Golden Elephant:

सोने का हाथी:
लोनावला की धुंध भरी पहाड़ियां हों या कश्मीर की डल झील का शांत पानी—दृश्य चाहे जो भी हो, वहां का अर्थशास्त्र एक ही सत्य पर टिका है। जब एक पर्यटक अपनी गाड़ी से उतरता है, तो वह सबसे पहले उस इंसान को ढूंढता है जो उसका हाथ थामकर उसे पहाड़ चढ़ा सके, जो उसका सामान उठा सके, या जो उसे घोड़े पर बैठाकर वादियों की सैर करा सके।
क्या कभी किसी ने उस घोड़े वाले से उसकी डिग्री पूछी? क्या कभी किसी कुली से उसका पीएचडी सर्टिफिकेट मांगा? नहीं। वहां विदेशी मुद्रा और पसीने की कमाई के नोट उस इंसान के हाथ में रखे जाते हैं जो अनुभव और सेवा प्रदान करता है। यही वह 'एक्सपीरियंस इकोनॉमी' (अनुभव आधारित अर्थव्यवस्था) है, जिसे हम अक्सर किताबी ज्ञान के चक्कर में अनदेखा कर देते हैं।
सोने से कीमती: जीवित खजाना
आज दुनिया सोने के पीछे भाग रही है, लेकिन भारत के पास एक ऐसा 'मानवीय सोना' है जिसकी चमक के आगे पीली धातु भी फीकी है। जरा सोचिए, एक ऐसा व्यक्ति जिसने 115 से 120 साल का इतिहास अपनी आंखों में संजोया हो, वह क्या है? वह केवल एक इंसान नहीं, वह एक जीवित पुस्तकालय है।
पूरी दुनिया में 115 साल से अधिक उम्र के लोगों की संख्या इतनी कम है कि उन्हें उंगलियों पर गिना जा सकता है। यह एक ऐसी दुर्लभता है जिसके लिये पूरी दुनिया तरसती है। लेकिन हमारे भारत के 6 लाख गांवों में अगर हर गांव में हम अपने एक बुजुर्ग को सही देखभाल और सम्मान से इस उम्र तक पहुंचा सकें, तो हमारे पास 6 लाख जीवित धरोहरें होंगी।
यह संख्या दुनिया के 60 से अधिक छोटे देशों की आबादी से भी ज्यादा है। हम सिर्फ एक देश नहीं, हम अनुभवों का एक पूरा महाद्वीप बन जाएंगे।
'सोने का हाथी' अर्थव्यवस्था
कल्पना कीजिए भविष्य के उस भारत की, जहां हर गांव एक 'ग्लोबल हेरिटेज साइट' है। न्यूयॉर्क, टोक्यो और लंदन के हवाई अड्डों पर बैठा पर्यटक पेरिस जाने के बजाय भारत के किसी सुदूर गांव का टिकट कटा रहा है। वह बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन पर उतरकर केवल एक ही सवाल पूछ रहा है— "साहब, क्या आप मुझे उन दादाजी के दर्शन करा सकते हैं जिन्होंने तीन सदियां देखी हैं?"
वहां डॉलर और यूरो किसी कॉर्पोरेट ऑफिस की फाइलों में नहीं, बल्कि गांव की एक छोटी सी चाय की दुकान पर गिर रहे होंगे। वह पर्यटक उस बुजुर्ग के पास बैठकर उनकी कहानियां सुनेगा, हमारे सात्विक भोजन का स्वाद लेगा, और हमारे रहन-सहन की सादगी को अपनी यादों में समेटेगा।
इसका परिणाम क्या होगा? गांव के युवा को अब नौकरी की तलाश में मुंबई या बेंगलुरु की भीड़ में अपनी पहचान खोने की जरूरत नहीं होगी। वह अपने ही गांव में गाइड बनेगा, ऐस्काॅर्ट बनेगा, टैक्सी मालिक बनेगा, कोई उसकी टैक्सी चलाकर पेट भरेगा, कोई शै़फ बनेगा, कोई होम-स्टे चलाएगा और कोई जैविक खेती करेगा। गांव का बना शुद्ध अचार पापड़ जब डॉलर के भाव बिकेगा; जब डॉलर सीधे गांव की मिट्टी में गिरेगा, तो पलायन रुकेगा और हमारी संस्कृति ही हमारा सबसे बड़ा निर्यात (Export) बन जाएगी। हमारे बुजुर्गों की लंबी उम्र, हमारा खान-पान, रहन-सहन दुनिया के लिए सबसे बड़ा आकर्षण होगा।
चिड़िया से हाथी तक
इतिहास गवाह है कि भारत को कभी 'सोने की चिड़िया' कहा जाता था। लेकिन चिड़िया छोटी होती है, नाजुक होती है, जो डरकर उड़ जाती है। विदेशी आक्रांता आए और उस चिड़िया को लूटकर ले गए।
लेकिन आज, जब हम अपनी जड़ों को पहचानते हैं और अपने बुजुर्गों को सम्मान का केंद्र बनाते हैं, तो हम 'सोने की चिड़िया' नहीं, बल्कि 'सोने का हाथी' बन रहे हैं। हाथी—जो विशाल है, जो जमीन से जुड़ा है, जो बुद्धिमान है और जिसकी शक्ति अटूट है।
एक 120 साल का बुजुर्ग हमारे समाज का वह स्तंभ है जो हमें स्थिरता देता है। उनकी सेवा करना केवल हमारा धर्म नहीं, बल्कि हमारे देश को दुनिया की सबसे शक्तिशाली और स्थिर अर्थव्यवस्था बनाने का सबसे सटीक मार्ग है।
जिस दिन हम अपने बुजुर्गों की मुस्कुराहट में डॉलर और विकास की चमक देखने लगेंगे, उस दिन भारत का वैभव 'सोने के हाथी' की तरह पूरी दुनिया के सामने शान से खड़ा होगा।
ताजमहल की सीढ़ियों पर खड़ा मैं पर्यटकों को देख रहा था।
जापान से आई एक बुज़ुर्ग महिला, अमेरिका का एक युवा दंपति, अफ्रीका से आए कुछ छात्र—सबके हाथ में कैमरे थे, आँखों में चमक थी, और जेब में डॉलर।
वे किसी से यह नहीं पूछ रहे थे कि घोड़े वाले ने कितनी पढ़ाई की है, कुली के पास कौन-सी डिग्री है, या गाइड का इंजीनियरिंग लाइसेंस कहाँ का है।
वे बस पूछ रहे थे—
“वहां क्या है?”
“यहाँ क्या हुआ था?”
“वह कहानी सुनाओ।”
और वे खुशी-खुशी पैसे दे रहे थे।
डिग्री के लिए नहीं।
लाइसेंस के लिए नहीं।
एक अनुभव के लिए।
एक मानव जुड़ाव के लिए।
यही है Experience Economy—जहाँ ज्ञान से ज़्यादा, जीवन बिकता है। जहाँ प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि स्मृतियाँ मूल्य बनती हैं।
यहीं से एक सवाल जन्म लेता है—
अगर एक इमारत की कहानी अरबों कमा सकती है,
तो उस इंसान की कहानी की कीमत क्या होगी जिसने 115 से 120 साल का भारत जिया हो?
दुनिया आज सोने के पीछे भाग रही है।
सोना—एक धातु। ठंडी, निर्जीव, चमकदार पर मौन।
लेकिन भारत के पास एक ऐसा खज़ाना है, जो बोलता है, हँसता है, याद करता है, और आशीर्वाद देता है—
मानव सोना।
सोचिए, एक ऐसा व्यक्ति जिसने
अंग्रेज़ों का राज देखा,
आजादी का सूरज उगते देखा,
भूख भी देखी, हरित क्रांति भी,
रेडियो से मोबाइल तक का सफ़र जिया,
और आज भी साँसों में इतिहास ढो रहा है।
दुनिया में 115–120 वर्ष तक जीने वाले लोग अत्यंत दुर्लभ हैं।
गिने-चुने।
इतने कम कि कई देश उन्हें “नेशनल ट्रेज़र” घोषित कर देते हैं।
उन पर रिसर्च होती है, डॉक्यूमेंट्री बनती हैं, फाउंडेशन बनते हैं।
अब भारत की कल्पना कीजिए।
छह लाख से अधिक गाँव।
अगर हम अपने जीवन, भोजन, समुदाय और देखभाल की परंपराओं को इतना सशक्त करें कि हर गाँव से एक व्यक्ति भी 115–120 वर्ष तक स्वस्थ जिए—
तो हमारे पास होंगे 6 लाख जीवित खज़ाने।
यह संख्या दुनिया के 60 से ज़्यादा छोटे देशों की कुल जनसंख्या से बड़ी होगी।
यह दुर्लभता नहीं—यह स्केल के साथ दुर्लभता होगी।
और यही असली शक्ति है।
अब दृश्य बदलता है।
एक भविष्य की सुबह।
दिल्ली, मुंबई, कोच्चि के एयरपोर्ट पर लोग उतरते हैं।
उनके हाथ में बैग है, पासपोर्ट है, और एक ही सवाल—
“Can you take me to the Elder?”
हर गाँव अब एक Global Heritage Site है।
कोई महल नहीं, कोई संग्रहालय नहीं—
बस एक मिट्टी का आँगन,
नीम की छाया,
और 115 साल की झुर्रियों में चमकता हुआ चेहरा।
वह बुज़ुर्ग कहानी सुनाता है।
अपने बचपन की, अपने गाँव की, अपने समय की।
पर्यटक चुपचाप सुनते हैं।
कोई नोट्स लेता है, कोई रो पड़ता है।
और डॉलर—
वे दिल्ली के मॉल में नहीं रुकते।
वे सीधे गाँव की चाय की दुकान में गिरते हैं।
ड्राइवर कमाता है।
रसोइया कमाता है।
स्थानीय युवा अनुवादक बनता है, होस्ट बनता है, संरक्षक बनता है।
कोई शहर भागने की ज़रूरत नहीं।
रोज़गार वहीं है, जहाँ जड़ें हैं।
संस्कृति बचाकर कमाई होती है।
खाना शुद्ध रहता है, क्योंकि वही जीवन बढ़ाता है।
बुज़ुर्ग बोझ नहीं—आर्थिक केंद्र बन जाते हैं।
यह है Golden Elephant Economy।
हाथी—क्योंकि वह बड़ा है, स्थिर है, याददाश्त रखता है।
सोने का—क्योंकि उसकी कीमत केवल चमक में नहीं, बल्कि भार में है।
कभी भारत को कहा जाता था—सोने की चिड़िया।
सुंदर, पर नाज़ुक।
उड़ाकर ले जाई जा सकने वाली।
अब समय है एक नए रूप का।
अगर हम अपने बुज़ुर्गों को संभालें,
उनके जीवन को लम्बा, सम्मानजनक और स्वस्थ बनाएँ,
तो हम चिड़िया नहीं रहेंगे।
हम बनेंगे—
सोने का हाथी।
भारी।
ज़मीन से जुड़ा।
बुद्धिमान।
और ऐसा समृद्ध—जिसे कोई उठा नहीं सकता, केवल देखकर सीख सकता है।
क्योंकि असली सोना खदान में नहीं होता।
वह झुर्रियों में होता है।
और भारत—
उसकी सबसे बड़ी खदान है।
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“झुमका गिरा रे बरेली के बाज़ार में…”
लेकिन सोचिए — बरेली से भी बड़े 50 से ज्यादा शहर भारत में हैं।
इन शहरों और कस्बों में मिलाकर
अफगानिस्तान की आबादी से ज्यादा कॉलेज स्टूडेंट पढ़ रहे हैं।
और देश भर में जितने लोग कोलकाता के ईडन गार्डन में बैठ सकते हैं,
उससे भी ज्यादा उच्च शिक्षा संस्थान मौजूद हैं।
पर हकीकत?
पूरे देश में हर साल
सिर्फ बरेली की आबादी के बराबर लोगों को ही नौकरी मिल पाती है।
यानी ढांचा विशाल…
पर अवसर सीमित।
अब सोचिए —
अगर इस महा-भयंकर परिस्थिति में
आपके स्नातक भतीजे को
सिर्फ एक महीने की प्रैक्टिकल भट्टी में तैयार करके
उसे अगले महीने नौकरी से जुड़ने लायक बना दिया जाए…
तो बताइए —
क्या आप वह भट्टी किराये पर लेंगे?
यही अंतर है —
डिग्री से आगे, कमाई तक का रास्ता।
पर उसका परिणाम क्या होगा?
उसकी मदद से भारत के बुज़ुर्ग, क्या सोने से भी ज़्यादा कीमती बन जायेंगे???
क्यों, क्या अब भी नहीं समझा; कैसे भारत के बुज़ुर्ग सोने से भी ज़्यादा कीमती हो सकते हैं?

